( तर्ज - नारायण जिनमे हिरदेमें ० )
प्रेमको मारग छोड दियो ,
फिर नेमसे कोइ न
तार सके रे ||टेक||
नेम रहे अरु प्रेम नही हो ,
अंतर - भक्ति न जाग सके रे ।
मूरत पूजत दिन बीते पर ,
मर्म न कोउभि जान सके रे || १ ||
बाहर कर्म सभी कर लीन्हो ,
चित्त रहे परदेश फरारे ।
शास्त्र पुराण पढे बहु भारी ,
क्या बनता बातनसे प्यारे ! || २ ||
तीरथ कर कर उमर गुजारी ,
क्रोध बढाय अती मनमों रे ।
तुकड्यादास कहे , बिरथा है ,
बिन भक्ती सब फाल पिया रे ! || ३ ||
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